New Delhi: एक मां अपने बच्चे के लिए क्या नहीं करती. बच्चे के पैदा होने से पहले ही एक मां का संघर्ष शुरू हो जाता है. 9 महीने पेट में पालना और फिर जिंदगी भर बच्चों का भविष्य संवारना. आज हम आपको एक ऐसी ही एक मां की कहानी बताएंगे जिसने अपने बेटे को सफलता क चीढ़ी चढ़ाने के लिए खुद बस की चीढ़ी पर चढ़ गई..

हम बात कर रहे हैं अथर्व अंकोलेकर की मां की. जानते हैं ये कौन हैं? भारतीय टीम अंडर-19 एशिया कप पर 7वीं बार कब्जा करने में कामयाब रही. भारत की जीत के हीरो हैं. 18 साल के अथर्व अंकोलेकर. अथर्व जब 10 साल के थे, तब उनके पिता विनोद अंकोलेकर का साया परिवार से उठ गया. उनके पिता मुंबई की बसों में कंडक्टर का काम करते थे. पिता चाहते थे कि अथर्व क्रिकेटर बने और उनका सपना पूरा भी हुआ..

मैं वैदेही ने पति के सपनों को पूरा किया और बेटे को इस मुकाम तक पहुंचाया. उसने बेटों की परवरिश के लिए पति की जगह बस कंडक्र की नौकरी करने लगीं. ऐसे में उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा. लेकिन वो डटी रही. हार नहीं मानी. मां ने बस कंडक्टर का काम किया और खुद भूखे रहकर बच्चों का सपना पूरा किया.

मां के संघर्ष की बदौलत अथर्व ने न सिर्फ अपने देश कौ चैम्पियन बनाया, बल्कि पिता के सपनों को भी सच कर दिखाया. वैदेही की ड्यूटी मारोल बस डिपो पर हैं.

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Naina Shrivastava

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