New Delhi: सारे संसार का इतिहास त्याग और बलिदान की गाथाओं से भरा पड़ा है. भारत की धरती पर भी ना जाने कितने वीरों और वीरांगनाओं ने जन्म लिए. उन्हीं में से आकाश में चमकते नक्षत्र की भांति, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम भी अग्रणी श्रेणी में लिया जाता है..

यब बात साल 1857 की है, जब भारत में पहली बार अंग्रेजों के खिला’फ क्रां’ति की एक विशाल लहर उठी थी जिसने लगभग समपूर्ण भारत को अपनी चपेट में ले लिया था यह घट’ना तब की है जब अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा कर लिया था और रानी लक्ष्मी बाई अपने कुछ प्रमुख विश्वासपात्रों के साथ कालपी जा पहुंची थीं. कालपी से ग्वालियर जिवाजीराव की सहायता का शिव्वास लिए घोड़ा दौड़ाती रहीं, परंतु जिवाजीराव अंग्रेजों से जा मिले. किंतु रानी ने ग्वालियर की गद्दी पर सर्वसम्मति से पेशवा राव साहब को बैठा दिया था.

मोरोपंत की नन्हीं सी मनु बचपन से ही वीरता और तेजस्विता की मूर्ति थी..उनका लालन पालन बिठूर के पेशवा बाजीराव के यहां हुआ था. उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ था. विवाह के बाद रानी लक्ष्मी बाई ने झांसी को सशक्त राज्य बनाने का प्रयास किया. उन्होंने स्त्रियों की भी सेना बनाई. वह प्रतिदिन सैन्य प्रशिक्षण भी देती थीं.

दुर्भाग्यवश गंगाधर राव का असमय ही देहांत हो गया. रानी ने दामोदर राव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया. रानी जीवट वाली थी, वह आसानी से अपनी झांसी अंग्रेजों को नहीं दे सकती थी. उन्होंने कहा- मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी. अनकी यही प्रतिज्ञा उनकी प्रजा के लिए, सेना के लिए प्रेरणा बन गई, और उसकी का परिणाम था कि रानी ने जीतोड़ प्रयास किया ताकि अन्य राजा, महाराजा भी शामिल हो जाएं.

लेकिन भारत के अधिकांश शासल निकम्मे हो चुके थे, अंग्रेजों के चुंगुल में फंस चुके थे. ऐसे में रानी ने अंग्रेजों से अकेले ही लड़ने का फैसला लिया. उनका त्याग और बलिदान भारतवासियों के लिए आज भी अनुकरणीय है. 23 वर्ष की आयु की अल्पावस्था में रानी ने ऐसा दीपक जलाया जिसने हर भारतवासी को प्रेरणा का पथ दिखाया. वह सचमुच दर्गा का अवतार थी…

रानी थी या दुर्गा थी या स्वंय वीरता का अवतार
देख मराठे पुलकित होते, उसकी तलवारों के वार

प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की जयंती पर सादर नमन..अपने शौर्य और वीरता से उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का साहसपूर्वक विरो’ध करते हुए मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्रा’ण तक न्यौछावर कर दिए.. उनका अदम्य साहस और शौर्य आज भी प्रेरणा देता है..

About Author

Naina Shrivastava

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *